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SC की सख्ती के बाद NCERT का बड़ा फैसला : कक्षा 8 की किताब से हटाया विवादित चैप्टर, 2.25 लाख किताबें वापस लेने की तैयारी

Media Yodha Desk Thu, Feb 26, 2026

नई दिल्ली: कक्षा 8 की सोशल साइंस की नई पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से जुड़े संदर्भों को लेकर उठे विवाद के बाद राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) ने माफी मांगते हुए किताब के वितरण पर “सख्त रोक” लगा दी है. शिक्षा मंत्रालय से जुड़े सूत्रों के अनुसार, छपी 2.25 लाख प्रतियों में से केवल 38 प्रतियां ही बिक पाईं, जबकि 2,24,962 प्रतियां स्टॉक में रह गईं, जिन्हें अब वापस गोदाम में मंगाया जा चुका है. NCERT बिक चुकी 38 प्रतियों को भी वापस हासिल करने की कोशिश कर रही है.

विवाद का क्या है कारण?

विवादित किताब ‘Exploring Society: India and Beyond, Vol II' में अध्याय 4 - The Role of Judiciary in Our Society  में न्यायपालिका के समक्ष मौजूद चुनौतियों के तौर पर विभिन्न स्तरों पर भ्रष्टाचार, मामलों की भारी लंबित संख्या और जजों की कमी जैसे मुद्दों का उल्लेख किया गया था. इसमें लंबित मामलों के आंकड़े और एक पूर्व प्रधान न्यायाधीश के कथन का हवाला भी शामिल था, जिस पर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली. 

NCERT ने मांगी माफी

NCERT ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि किताब मौजूदा प्रक्रियाओं के तहत प्रकाशित की गई थी, लेकिन वितरण के बाद यह पाया गया कि अध्याय में कुछ “अनुचित सामग्री और निर्णय संबंधी त्रुटियां” रह गई हैं. परिषद ने इसे अनजाने में हुई गलती बताते हुए औपचारिक रूप से माफी मांगी और कहा कि न्यायपालिका के सम्मान पर आंच पहुंचाने का कोई इरादा नहीं था. 

कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने सुप्रीम कोर्ट में उठाया मामला

मामला तब और गंभीर हो गया जब वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने इस मुद्दे को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष उठाया. इसके बाद प्रधान न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस पर स्वत: संज्ञान लिया और इसे “गंभीर चिंता का विषय” बताया. कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वह किसी को भी न्यायपालिका की छवि धूमिल करने की अनुमति नहीं देगा.

NCERT ने दोहराया कि वह न्यायपालिका को संविधान का संरक्षक और मौलिक अधिकारों का रक्षक मानती है तथा नई पाठ्यपुस्तकों का उद्देश्य छात्रों में संवैधानिक समझ और संस्थागत सम्मान को मजबूत करना है, न कि किसी संवैधानिक संस्था की छवि को नुकसान पहुंचाना.  

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