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: सुप्रीम कोर्ट ने द्विविवाह मामले में महिला और उसके दूसरे पति को 6 महीने की जेल की सजा सुनाई

admin Tue, Jul 16, 2024

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक महिला और उसके दूसरे पति को द्विविवाह के अपराध में छह महीने की जेल की सजा सुनाई,

जबकि अदालत ने यह ध्यान रखते हुए एक असामान्य और विचारशील सजा योजना बनाई, कि दंपति का एक छह साल का बच्चा है। जस्टिस सीटी रविकुमार और संजय कुमार की पीठ ने आदेश दिया, कि पहले दूसरा पति आत्मसमर्पण कर अपनी सजा काटे। उसके जेल की सजा पूरी करने के बाद, महिला को अपनी सजा काटने के लिए दो सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करना होगा। इस क्रमिक सजा के तरीके से यह सुनिश्चित होगा कि बच्चे के साथ हमेशा , एक अभिभावक रहेगा जबकि दूसरा जेल की सजा काट रहा होगा।

यह मामला एक महिला से संबंधित है जिसने अपने पहले विवाह को कानूनी रूप से समाप्त किए बिना दूसरा विवाह किया।

शिकायत उसके पहले पति ने दर्ज कराई थी, जिसने मद्रास उच्च न्यायालय के अगस्त 2022 के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, जिसमें महिला और उसके दूसरे पति को "कोर्ट के उठने तक कारावास" की सजा सुनाई गई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने इस सजा को "फ्ली-बाइट सजा" के रूप में वर्णित किया, जो अपराध की गंभीरता के लिए अपर्याप्त थी।

पीठ ने इस अपराध की गंभीरता को दर्शाने वाली सजा देने के महत्व को रेखांकित किया, जिसमें अपराध के घटित होने की परिस्थितियाँ और अपराधी का पिछला आचरण शामिल था। गंभीर अपराधों के लिए नरम सजा का समाज पर हानिकारक प्रभाव पड़ सकता है, इसे मानते हुए कोर्ट ने कहा: "एक ऐसे अपराध के लिए सजा देते समय, जो समाज पर प्रभाव डाल सकता है, अभियुक्त को दोषसिद्धि के बाद मामूली सजा देना उचित नहीं है।"

कोर्ट ने यह भी बताया कि सजा प्रदान करने में आनुपातिकता के नियम को बनाए रखना महत्वपूर्ण है |

ताकि समाज में व्यवस्था और न्याय बना रहे। सजा में सभी प्रासंगिक तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार किया जाना चाहिए, न कि केवल अपराध के बाद बीते समय के आधार पर निर्णय लिया जाना चाहिए। यह कहते हुए कि अपराध की गंभीरता के अनुपात में उचित सजा आवश्यक है | ताकि नागरिक व्यवस्था और कानूनी प्रणाली में समाज का विश्वास बना रहे, पीठ ने कहा कि समाज के हितों की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए, जबकि पीड़ित के अधिकारों पर भी विचार किया जाना चाहिए। "केवल समय के बीतने के कारण दी गई मामूली सजा, बिना अपराध की गंभीरता पर विचार किए, लंबे समय में प्रतिकूल साबित होगी और समाज के हित के खिलाफ होगी," पीठ ने कहा।
इस मामले में, कोर्ट ने यह भी नोट किया कि भारतीय दंड संहिता की धारा 494 अधिकतम सात साल की जेल की सजा का प्रावधान करती है |
जबकि यह अपराध केवल पति या पत्नी की सहमति से और कोर्ट की अनुमति से संज्ञेय होता है। यह दंड प्रावधान 1 जुलाई से प्रभावी भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 82 के तहत भी रखा गया है। "एक बार यह पाया जाता है कि धारा 494 IPC के तहत अपराध गंभीर है, इस मामले में मौजूदा परिस्थितियाँ हमें यह मानने के लिए मजबूर करती हैं | कि 'कोर्ट के उठने तक कारावास' की सजा आनुपातिकता के नियम के अनुरूप नहीं है," पीठ ने उच्च न्यायालय के आदेश को रद्द करते हुए कहा।
महिला और उसके दूसरे पति को दी गई सजा को "अवांछनीय रूप से नरम" बताते हुए, पीठ ने यह भी पाया ,
कि यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि महिला को पहले पति से बच्चे के जन्म के दो महीने पहले तक भरण-पोषण मिला था। "यह स्पष्ट है कि पहली अभियुक्त (महिला) ने दूसरे अभियुक्त से शादी की, जबकि अपीलकर्ता (पहले पति) और उसके बीच विवाह कायम था। न केवल यह, इस दौरान उसने दूसरे अभियुक्त के साथ एक बच्चे को जन्म भी दिया। सभी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, यह कहा जा सकता है , कि इस मामले में अनुचित नरमी दिखाई गई थी," पीठ ने कहा। कोर्ट ने फिर महिला और उसके दूसरे पति की सजा को छह महीने की जेल में बढ़ा दिया, जिसमें यह शर्त थी कि वे बारी-बारी से सजा भुगतेंगे ताकि बच्चे के साथ हमेशा एक अभिभावक रहे।
"इस व्यवस्था को एक मिसाल के रूप में नहीं माना जाएगा क्योंकि यह विशेष परिस्थितियों में आदेशित किया गया था," पीठ ने स्पष्ट किया।
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