Spicy Food Benefits : क्या तीखा खाना खाने वाले सच में ज्यादा जीते हैं? नई रिसर्च में हार्ट हेल्थ को लेकर बड़ा खुलासा
Tue, Oct 20, 2026
Spicy Food Benefits:
अक्सर घर के बड़े-बुजुर्ग ज्यादा चटपटा खाने पर हमें टोकते हैं, लेकिन अगर आपको भी अपने खाने में वो तीखापन पसंद है, तो हमारे पास आपके लिए एक बड़ी खुशखबरी है। जी हां, स्टडी बताती है कि मसालेदार खाने से मिलने वाले फायदों के पीछे कई ठोस वैज्ञानिक कारण मौजूद हैं। आइए, इस आर्टिकल में विस्तार से जानते हैं।
लंबी उम्र और मिर्च का कनेक्शन
क्या तीखा खाने से इंसान ज्यादा जीता है? इस सवाल का जवाब जानने के लिए 2015 में चीन में एक बहुत बड़ी रिसर्च की गई। वैज्ञानिकों ने 2004 से 2008 के बीच करीब 5 लाख लोगों के खान-पान पर नजर रखी और इसके नतीजे काफी चौंकाने वाले रहे। दरअसल, जो लोग हफ्ते में 6 से 7 दिन मसालेदार खाना खाते थे, उनमें मौत का खतरा उन लोगों के मुकाबले 14% कम था जो हफ्ते में बमुश्किल एक बार तीखा खाते थे। तीखा खाने वालों में दिल, फेफड़े की बीमारियों और कैंसर से होने वाली मौत का जोखिम भी कम पाया गया। सबसे खास बात यह थी कि यह फायदा तब भी दिखा जब वैज्ञानिकों ने सिगरेट पीने, कसरत करने या मीट-सब्जियां खाने जैसी अन्य आदतों का भी हिसाब रखा। बता दें, अमेरिका में भी दो साल बाद एक ऐसा ही अध्ययन हुआ, जिसमें पाया गया कि लाल मिर्च खाने वाले लोगों में मौत का जोखिम 13 फीसदी तक कम था।
आखिर ये कमाल है किसका?
मिर्च में एक खास सक्रिय तत्व पाया जाता है, जिसे 'कैपसेसिन' कहते हैं। यही हमारे शरीर के 'TRPV1 रिसेप्टर्स' पर खास असर डालता है। ये रिसेप्टर्स हमारे शरीर में गर्मी और तीखेपन दोनों को भांप लेते हैं। ये सिर्फ मुंह में नहीं, बल्कि हमारी त्वचा, आंतों और इम्युनिटी बढ़ाने वाली कोशिकाओं में भी मौजूद होते हैं। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि आप कल से ही डिब्बे भर-भर कर मिर्च खाना शुरू कर दें। वैज्ञानिक कहते हैं कि इसके फायदे जरूर हैं, लेकिन यह सौ प्रतिशत साबित नहीं हुआ है कि लंबी उम्र का इकलौता कारण तीखा खाना ही है।
दिल की सेहत भी सुधारता है तीखा खाना
तीखे खाने का असर सीधा आपके दिल और ब्लड प्रेशर पर भी पड़ता है। कई स्टडीज बताती हैं कि कैपसेसिन शरीर में 'गुड कोलेस्ट्रॉल' को बढ़ा सकता है। गुड कोलेस्ट्रॉल का बढ़ना हार्ट अटैक के खतरे को सीधे तौर पर कम करता है। साथ ही, यह शरीर की कैलोरी भी तेजी से बर्न करता है। चीन में हुई 2017 की एक स्टडी में सामने आया कि जो लोग तीखा खाते हैं, वो खाने में नमक का इस्तेमाल कम करते हैं। इसके पीछे कारण यह है कि कैपसेसिन हमारे दिमाग में नमक का स्वाद बढ़ा देता है। यानी खाने में थोड़ी मिर्च हो, तो कम नमक भी काफी लगता है। इससे ब्लड प्रेशर भी कंट्रोल में रहता है।
हर किसी को रास नहीं आती मिर्च
अगर आपको तीखा पसंद है, तो शौक से खाइए, लेकिन सीमित मात्रा में। अगर मिर्च खाने से आपकी तबीयत खराब होती है या आपको पेट में दिक्कत महसूस होती है, तो इन फायदों को पढ़कर जबरदस्ती तीखा न खाएं। हर किसी का शरीर मिर्च पर अलग तरह से रिएक्ट करता है।
न दशहरे पर रावण जलता है, न होली पर होलिका : छत्तीसगढ़ के इस गांव की अनोखी मान्यता जानकर रह जाएंगे हैरान
Tue, Oct 20, 2026
धमतरी :
भारत में दशहरा और होली जैसे त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक माने जाते हैं। दशहरे पर रावण दहन और होली से पहले होलिका दहन की परंपरा देशभर में निभाई जाती है। लेकिन छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में एक ऐसा गांव है, जहां इन दोनों परंपराओं का पालन नहीं किया जाता। इतना ही नहीं, गांव की सीमा के भीतर किसी व्यक्ति की मृत्यु होने पर उसका अंतिम संस्कार भी नहीं किया जाता। तेलीनसत्ती गांव में सदियों से चली आ रही इस अनूठी परंपरा के पीछे सत्ती माता से जुड़ी एक मान्यता है।
करीब 800 साल पुरानी मान्यता से जुड़ी है कहानी
ग्रामीणों और बुजुर्गों के अनुसार, तेलीनसत्ती गांव की यह परंपरा लगभग 800 साल पुरानी है। मान्यता है कि प्राचीन समय में गांव में पानी का गंभीर संकट पैदा हो गया था। गांव के तालाब का मिट्टी से बना बांध टूटने लगा था और पानी तेजी से बाहर निकल रहा था। ऐसी स्थिति में एक व्यक्ति ने बांध को बचाने के लिए मिट्टी के साथ खुद को उसके सामने लगा दिया। इस प्रयास के दौरान उसकी मृत्यु हो गई।
कहा जाता है कि पति की मौत की खबर सुनकर उसकी पत्नी ने भी अपने प्राण त्याग दिए थे। ग्रामीणों की मान्यता के अनुसार, महिला सती हो गई थीं। इसके बाद उन्हें गांव की आराध्य देवी के रूप में पूजा जाने लगा। स्थानीय परंपरा के मुताबिक, उन्हीं के नाम पर गांव का नाम तेलीनसत्ती पड़ा और लोग उन्हें सत्ती माता के रूप में पूजते हैं।
गांव की सीमा के भीतर नहीं जलती चिता
तेलीनसत्ती गांव की सबसे खास परंपराओं में से एक यहां अंतिम संस्कार से जुड़ी है। ग्रामीण मान्यता के अनुसार, गांव की सीमा के भीतर किसी व्यक्ति की चिता नहीं जलाई जाती। किसी की मृत्यु होने पर शव को सम्मानपूर्वक पड़ोसी गांव की सीमा तक ले जाया जाता है, जहां अंतिम संस्कार किया जाता है।
ग्रामीणों का विश्वास है कि गांव की सीमा के भीतर आग जलाने से सत्ती माता नाराज हो सकती हैं। बुजुर्गों के अनुसार, अतीत में इस परंपरा का उल्लंघन करने पर कुछ लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ा था। हालांकि, इन घटनाओं और उनसे जुड़ी मान्यताओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
रावण दहन और होलिका दहन से भी परहेज
तेलीनसत्ती गांव में धार्मिक परंपराओं के तहत सार्वजनिक रूप से अग्नि प्रज्वलित करने से परहेज किया जाता है। इसी मान्यता के चलते यहां दशहरे पर रावण दहन और होली से पहले होलिका दहन नहीं किया जाता। ग्रामीण इन परंपराओं को सत्ती माता के प्रति अपनी आस्था और सम्मान से जोड़कर देखते हैं।
आज भी कायम है सदियों पुरानी परंपरा
आधुनिक दौर में भी गांव के लोग अपनी इस मान्यता का पालन करते आ रहे हैं। ग्रामीणों के अनुसार, शुभ कार्यों की शुरुआत सत्ती माता का आशीर्वाद लेकर की जाती है। तेलीनसत्ती की यह परंपरा छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति, धार्मिक आस्था और ग्रामीण जीवन से जुड़ी मान्यताओं की एक अलग तस्वीर पेश करती है। करीब आठ शताब्दियों से चली आ रही इस परंपरा के पीछे की कहानी आज भी गांव के लोगों की आस्था का अहम हिस्सा बनी हुई है।