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गेमिंग से कौन सा हार्मोन एक्टिव होता है : जानें शरीर और दिमाग पर पड़ने वाले असर

Media Yodha Desk Tue, Feb 10, 2026

आज के डिजिटल दौर में गेम बच्चों से लेकर बड़ों तक की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं. मोबाइल, लैपटॉप और कंसोल पर घंटों गेम खेलना आम बात हो गई है. लेकिन इसी के साथ एक सवाल लगातार उठा रहा है कि क्या ज्यादा गेमिंग दिमाग और शरीर के लिए खतरनाक है या इससे कुछ फायदे भी हैं. इसे लेकर वैज्ञानिक बताते हैं कि गेमिंग का असर सीधा हमारे दिमाग और हार्मोन सिस्टम पर पड़ता है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि गेमिंग की वजह से कौन सा हार्मोन एक्टिव हो जाता है और इससे बॉडी में कितने बदलाव होते हैं.

गेमिंग और दिमाग का कनेक्शन

आजकल वीडियो गेम इस तरह डिजाइन किए जाते हैं कि खिलाड़ी लंबे समय तक उनसे जुड़े रहे. इसके लिए गेम में रंग, आवाज, टास्क, रिवॉर्ड सिस्टम और लेवल को बहुत सोच समझ कर तैयार किया जाता है. एक्सपर्ट्स बताते हैं कि गेमिंग के दौरान दिमाग के कई हिस्से एक साथ एक्टिव होते हैं, खासतौर पर वह हिस्से जो रिवॉर्ड, इमोशन और डिसीजन लेने से जुड़े होते हैं.

डोपामिन गेमिंग का सबसे बड़ा हार्मोन

गेम खेलते समय सबसे पहले जिस हार्मोन की भूमिका सामने आती है, वह डोपामिन है. इसे फील गुड हार्मोन कहा जाता है. जब कोई खिलाड़ी गेम में लेवल पूरा करता है, जीत हासिल करता है या रिवॉर्ड पाता है तो दिमाग डोपामिन रिलीज करता है. इससे खुशी और उत्साह महसूस होता है और खिलाड़ी दौबारा खेलने के लिए प्रेरित होता है. लेकिन अगर गेम सीमित न रहे और लंबे समय तक लगातार हो तो दिमाग जरूरत से ज्यादा डोपामिन रिलीज करने लगता है. इससे धीरे-धीरे दिमाग उस डोपामिन के प्रति कम संवेदनशील हो जाता है. वहीं इसका नतीजा यह होता है कि खुशी पाने के लिए खिलाड़ी को पहले से और ज्यादा गेम खेलना पड़ता है. यही वजह है कि ज्यादा गेमिंग करने वालों में थकान, चिड़चिड़ापन, फोकस की कमी और ब्रेन फॉग जैसे लक्षण दिख सकते हैं.

फाइट या फ्लाइट मोड हो जाता है एक्टिव


एक्शन और लड़ाई वाले वीडियो गेम खेलते समय शरीर का फाइट या फ्लाइट रिस्पाॅन्स भी एक्टिव हो सकता है. यह वही सिस्टम है जो खतरे के समय हमें सतर्क करता है. ऐसे गेम्स के दौरान दिमाग कई बार खतरे को असली मान लेता है, जिससे गुस्सा, बेचैनी और आक्रामक व्यवहार बढ़ सकता है. इसी कंडीशन में दिमाग का भावनात्मक हिस्सा ज्यादा सक्रिय हो जाता है और तार्किक सोच कमजोर पड़ने लगती है.

एड्रेनालिन और कोर्टिसोल का असर

गेमिंग के दौरान एक और हार्मोन तेजी से बढ़ता है जो एड्रेनालिन है. तेज रफ्तार और रोमांचक गेम खेलते समय एड्रेनालिन रिलीज होता है, जिससे हार्ट रेट और ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है. लगातार ऐसा होने पर शरीर पर दबाव पड़ता है और खिलाड़ी को बेचैनी या थकान महसूस हो सकती है. इसके साथ ही कोर्टिसोल जिसे स्ट्रेस हार्मोन कहा जाता है, यह भी गेमिंग के दौरान बढ़ सकता है. अगर कोर्टिसोल लंबे समय तक एक्टिव रहे तो नींद में परेशानी, मूड खराब होना, डिप्रेशन और जंक फूड की क्रेविंग जैसी समस्याएं सामने आने आ सकती है ‌.

क्या गेमिंग पूरी तरह है खतरनाक?

वैज्ञानिक साफतौर पर बताते हैं कि गेमिंग अपने आप में खतरनाक नहीं है. अगर इसे सीमित समय में और संतुलन के साथ खेला जाए तो उसके फायदे भी है. वहीं रिसर्च बताती हैं कि सही मात्रा में गेमिंग से ध्यान केंद्रित करने की क्षमता, याददाश्त, सीखने की गति और समस्या सुलझाने की स्किल बेहतर होती है. वहीं कुछ गेम्स क्रिएटिविटी और स्ट्रैटेजिक थिंकिंग को भी बढ़ावा देते हैं.

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