छत्तीसगढ़ में 5 करोड़ का बैंक ऋण घोटाला : दो आरोपियों के खिलाफ EOW ने कोर्ट में पेश किया चालान
बिलासपुर : छत्तीसगढ़ में फर्जी फर्मों के नाम पर करोड़ों रुपये का बैंक ऋण लेने के मामले में आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (EOW) एवं भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) ने बड़ी कार्रवाई की है। जांच एजेंसी ने बैंक ऑफ वडोदरा की राजकिशोर नगर शाखा में हुए 5 करोड़ 4 लाख 15 हजार रुपये के ऋण घोटाले की जांच पूरी कर विशेष न्यायालय में चालान पेश किया है। इस मामले में बैंक के तत्कालीन वरिष्ठ शाखा प्रबंधक राहुल कुमार सिन्हा और विश्वजीत भौमिक को आरोपी बनाया गया है।
ब्यूरो के अनुसार, बैंक के क्षेत्रीय कार्यालय रायपुर से मिली शिकायत के आधार पर 28 जनवरी 2020 को मामला दर्ज किया गया था। इसके बाद एजेंसी ने पूरे प्रकरण की विस्तृत जांच की। जांच में सामने आया कि आरोपियों के कृत्य से बैंक को 5,04,15,000 रुपये का नुकसान हुआ। विवेचना पूरी होने के बाद विशेष न्यायालय (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम), बिलासपुर में आरोपियों के खिलाफ चालान प्रस्तुत किया गया।
लोगों के दस्तावेजों का दुरुपयोग कर बनाई फर्जी फर्में
जांच में खुलासा हुआ कि विश्वजीत भौमिक बिलासपुर के जरहाभाठा स्थित उड़ान माइक्रो फाइनेंस कार्यालय से लोगों को छोटे ऋण और बैंक से लोन दिलाने का काम करता था। इस दौरान वह आवेदकों से आधार कार्ड, पैन कार्ड, केवाईसी और संपत्ति से संबंधित मूल दस्तावेज जमा कराता था।
आरोप है कि इन दस्तावेजों का दुरुपयोग कर संबंधित लोगों की जानकारी और सहमति के बिना उनके नाम पर फर्जी फर्में बनाई गईं। कुछ फर्मों में भौमिक ने अपने कर्मचारियों को ही प्रोपराइटर दिखा दिया। जांच के दौरान तीन फर्मों के दुकान एवं स्थापना पंजीयन प्रमाणपत्र फर्जी पाए गए। वहीं, सात फर्मों के जीएसटी रिटर्न भी उड़ान माइक्रो फाइनेंस कार्यालय से ही दाखिल किए जा रहे थे।
बैंक अधिकारियों के निरीक्षण के दौरान इन फर्मों के पते पर कोई वास्तविक व्यावसायिक इकाई नहीं मिली।
11 अपात्र फर्मों को स्वीकृत किए गए ऋण
ब्यूरो की जांच के मुताबिक, 20 मार्च 2018 से 3 मई 2019 के बीच तत्कालीन वरिष्ठ शाखा प्रबंधक राहुल कुमार सिन्हा ने बैंक के नियमों और निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन किए बिना 11 अपात्र फर्मों को ऋण स्वीकृत किए थे। इन फर्मों को कैश क्रेडिट, ओवरड्राफ्ट, बैंक गारंटी और टर्म लोन जैसी सुविधाएं दी गईं।
ऋण मंजूर करने से पहले किए गए भौतिक सत्यापन में फर्मों के पते और कारोबार को लेकर गलत जानकारियां दर्ज की गईं। जांच में यह भी सामने आया कि एक फर्म का व्यावसायिक पता विश्वजीत भौमिक का निजी मकान था। सभी ऋण मामलों के अप्रेजल नोट भी तत्कालीन शाखा प्रबंधक ने खुद तैयार किए थे।
इतना ही नहीं, ऋण लेने वाले आवेदकों से असंबंधित अन्य लोगों की संपत्तियों को भी उनकी अनुमति के बिना बैंक में बंधक रख दिया गया। बाद में वर्ष 2019 में सभी 11 ऋण खाते एनपीए घोषित हो गए।
NSIC के जरिए अपनी फर्म में पहुंचाई ऋण की रकम
जांच एजेंसी के अनुसार, बैंक से जारी ऋण की राशि का अंतिम लाभ विश्वजीत भौमिक को मिला। आरोपियों ने राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम (NSIC) के माध्यम से ऋण की रकम भौमिक की अपनी फर्म ए.बी. फास्टनर्स में स्थानांतरित कराई।
इसके लिए NSIC रायपुर में कथित तौर पर फर्जी और जाली बिल प्रस्तुत कर भुगतान प्राप्त किया गया। इस तरह बैंक से स्वीकृत ऋण राशि का इस्तेमाल निर्धारित उद्देश्य के बजाय दूसरी जगह किया गया।
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत भी कार्रवाई
पूरी जांच के बाद EOW-ACB ने विश्वजीत भौमिक और तत्कालीन वरिष्ठ शाखा प्रबंधक राहुल कुमार सिन्हा के खिलाफ विशेष न्यायालय में चालान पेश किया है। दोनों आरोपियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 12 और 13(2) के तहत भी कार्रवाई की गई है। अब मामले की आगे की सुनवाई न्यायालय में होगी।
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